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Monday, September 14, 2009

तुमने लिखा............

तुमने लिखी
धरती
और वह हरी हो गई
तुमने आकाश लिखा
और वह नीला हो गया
तुमने सूरज लिखा
और वह छुप गया बादलों की ओट
तुमने चाँद लिखा
वह मुस्कराता रहा रात भर
तुमने हवा लिखी
नहा लिया उसने चंदन पराग
तुमने मुझे ही तो लिखा
बार-बार
लगातार

Thursday, August 20, 2009

उसकी खोज


वह खोजती है
उन शब्दों का साहचर्य
जहाँ आत्मा के पार का संसार
जीवित होता है,
और बांधता है पूरा आकाश,
वह खोजती है
उन क्षणों का सौन्दर्य
जहाँ शब्दों के बीच का मौन
महाकाव्य रचता है
सरल संस्तुतियों के साथ,
वह खोजती है
उन आत्मीय संबोधनों के स्वर
जहाँ पीड़ा भी संवरती है
निर्वसन निराकार,
वह खोजती है
उस तोष के कुछ सूत्र
जहाँ अथाह एकांत में
किया था उसने
मोक्ष से सहवास

Sunday, July 19, 2009

गूंगी अयोध्या


गूंगी अयोध्या

टूटते हैं मन्दिर यहाँ

टूटती है मस्जिद यहाँ

टूटकर बिखर जाते हैं अजान के स्वर

चूर चूर हो जाती हैं घंटियों की स्वरलहरियां

कोई नही बचाता यहाँ सरगमों के स्वर

कोई नही पोछता सरयू के आंसू

उसकी लहरों की उदास कम्पन

अक्सर भटकती है सरयू

खोजते हुए सीता की कल-कल हँसी
(24 july 2009 ki "India News" magazine mein dekhein)
(Editor-Dr.Sudhir saxena)

Thursday, June 25, 2009

तंदुल और मैं

सुदामा के तंदुल सी मैं
छुपती रही यहाँ -वहां
तुम मिले
तुमने छुआ
मुझे मिला
प्रेम का ऐश्वर्य।

गेंद और मैं

गेंद थी मै
लेकर चली गई
यमुना की अतल गहराइयों में
और जब उबरे
लहरों पर नर्तन था
और थी बांसुरी की धुन ।

Friday, April 24, 2009

TUMHAARA NAAM

तुम्हारा नाम
पैदा करता है
नजरों में ठहराव
किसी भी गणित से परे
बार-बार तुम्हारा नाम
क्यूँ टकराता है मुझसे ?
कभी गली के किसी मोड़ पर
चौराहे की चहल-पहल
या राह चलते किसी घर पर
ठिठक जाती हैं नजरें
विमुग्ध हो जाती हूँ मैं,
हथेली पर बहुधा
लिखती हूँ तुम्हे
छू लेती हूँ हौले से
भर लेती हूँ ऊर्जा,
अक्सर किताबों में
लिख देती हूँ तुम्हे
घर की दीवारों पर
बिना लिखे ही दिखता है
तुम्हारा नाम
तुम्हारे नाम के नीचे
लिख देती हूँ अपना नाम
और मेरी संवेदना पा लेती है
सामीप्य का एहसास,
तुम्हारा नाम लिख कर
सुंदर अल्पना में छुपा देती हूँ
और तुम्हारी उपस्थिति
भर देती है प्राणों में उल्लास,
तुम्हारा नाम
मानो पूरी परिधि वाला कवच
मैं बड़ी निश्चिंत हूँ उसके भीतर.

Tuesday, April 21, 2009

संदेश

प्रेम करती हूँ तुम्हे/सघन चीड़ों के बीच
हवा सुलझाती है अपने को
चमकता है चाँद phosphorus की तरह
घुमक्कड़ पानियों पर
दिन जा रहे एक समान, पीछा करते एक दूजे का
पसर जाती बरफ नाचते लोगों के बीच
पश्चिम की ओर से फिसल जाती नीचे
एक चमकीली समुद्री चिडिया
मैं उठ जाती हूँ कभी-कभी भोर ही में
भीगी होती मेरी आत्मा भी
सबसे बड़ा तारा मुझे तुम्हारी नज़र से देखता है
और जैसे मैं तुम्हे प्यार करती हूँ, हवाओं में,
देवदार गाना चाहते हैं तुम्हारा नाम
अपने पत्तों के साथ तार से संदेश भेजते हुए............

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