वह खोजती है उन शब्दों का साहचर्य जहाँ आत्मा के पार का संसार जीवित होता है, और बांधता है पूरा आकाश, वह खोजती है उन क्षणों का सौन्दर्य जहाँ शब्दों के बीच का मौन महाकाव्य रचता है सरल संस्तुतियों के साथ, वह खोजती है उन आत्मीय संबोधनों के स्वर जहाँ पीड़ा भी संवरती है निर्वसन निराकार, वह खोजती है उस तोष के कुछ सूत्र जहाँ अथाह एकांत में किया था उसने मोक्ष से सहवास
तुम्हारा नाम पैदा करता है नजरों में ठहराव किसी भी गणित से परे बार-बार तुम्हारा नाम क्यूँ टकराता है मुझसे ? कभी गली के किसी मोड़ पर चौराहे की चहल-पहल या राह चलते किसी घर पर ठिठक जाती हैं नजरें विमुग्ध हो जाती हूँ मैं, हथेली पर बहुधा लिखती हूँ तुम्हे छू लेती हूँ हौले से भर लेती हूँ ऊर्जा, अक्सर किताबों में लिख देती हूँ तुम्हे घर की दीवारों पर बिना लिखे ही दिखता है तुम्हारा नाम तुम्हारे नाम के नीचे लिख देती हूँ अपना नाम और मेरी संवेदना पा लेती है सामीप्य का एहसास, तुम्हारा नाम लिख कर सुंदर अल्पना में छुपा देती हूँ और तुम्हारी उपस्थिति भर देती है प्राणों में उल्लास, तुम्हारा नाम मानो पूरी परिधि वाला कवच मैं बड़ी निश्चिंत हूँ उसके भीतर.
प्रेम करती हूँ तुम्हे/सघन चीड़ों के बीच हवा सुलझाती है अपने को चमकता है चाँद phosphorus की तरह घुमक्कड़ पानियों पर दिन जा रहे एक समान, पीछा करते एक दूजे का पसर जाती बरफ नाचते लोगों के बीच पश्चिम की ओर से फिसल जाती नीचे एक चमकीली समुद्री चिडिया मैं उठ जाती हूँ कभी-कभी भोर ही में भीगी होती मेरी आत्मा भी सबसे बड़ा तारा मुझे तुम्हारी नज़र से देखता है और जैसे मैं तुम्हे प्यार करती हूँ, हवाओं में, देवदार गाना चाहते हैं तुम्हारा नाम अपने पत्तों के साथ तार से संदेश भेजते हुए............