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Saturday, July 17, 2010

तुम्हारी बारिश में.......

चाहती हूँ नहाना 
सिर से पाँव तक 
तुम्हारी बारिश में, 
तुम्हारे शब्दों की परतों में 
चाहती हूँ फैल जाना 
शबनमी छुअन बनकर 
उलीच देना है मुझे
उनके बीच समंदर, 
तुम्हारी बाँहों के बादल 
उमड़-घुमड़ कर आए हैं 
तरल गलबांह में प्रिय 
बांध लेना है सकल आकाश,
तुम्हारे अधरों की बूँदें 
बो रहीं रोमांच 
हवा की देह पर 
रोप देना है नदी की धार,
तुम्हारे मन के मेघो में 
इतनी मिठास ! इतनी मिठास ! 
भिगो देना है समूची सृष्टि को 
उसी में दिन रात । 

Sunday, June 20, 2010

थिरकती हूँ मै अहर्निश

एक धुन है 
जो लिपिहीन होकर 
गूँजती रहती है निरंतर 
अपनी व्याप्ति मे विलक्षण
उसकी लय पर 
थिरकती हूँ मै अहर्निश ,
एक धुन है 
जो छंदहीन होकर 
आरोहों अवरोहों से परे
अपनी त्वरा मे तत्पर 
विहगगान सी 
टेरती रहती है भीतर ,
एक धुन है 
जो नामहीन होकर 
सुरों से निर्लिप्त 
सरगमों मे डूबी 
स्वरों के व्याकरण से दूर 
रचती रहती है मधुर स्वर ,
एक धुन है 
जो डोरहीन होकर 
बंधी रहती है पतंग सी 
गगन को नापती 
करती अपनी ही प्रदक्षिणा 
फूँकती रहती है अपने हिस्से की बाँसुरी ।    

Saturday, May 29, 2010

मैं बरतती हूँ तुम्हें ऐसे......

मैं बरतती हूँ तुम्हे ऐसे
जैसे
हवा बरतती है सुगंध को
और दूब की नोक से चलकर
पहुचती है शिखर पर ,
मैं बरतती हूँ तुम्हे ऐसे
जैसे
जल बरतता है मिठास को
और घुलकर घनी भूत होकर
मिटाता है युगों की प्यास ,
मैं बरतती हूँ तुम्हे ऐसे
जैसे
धरती बरतती है हरी घास को
और उसकी हरियाली में
लहालोट हो छुपा लेती है चेहरा ,
मैं बरतती हूँ तुम्हे ऐसे
जैसे
उमंगें बरतती है उद्दाम को
और अपनी बाहों में
भर लेना चाहती हैं समूचा आकाश

Thursday, May 6, 2010

तुम्हारी आवाज .......

नदी की लहरों पर 
खुशी की धूप उगती है 
जब वह छूती है 
तुम्हारी आवाज ,
उसकी उदास लहरें 
पहन लेतीं हैं तुम्हारी महक 
नदी नहाती है अपनी ही 
भूली बिसरी चाहतें ,
भीग जाती है नदी 
उस धूप की मिठास में  
स्थगित धुनें सुर साध लेती हैं 
और नदी उस सरगमी नमी मे 
उमगकर डूब जाती है ,
बर्फीले सपनों को मिलती है 
नरम धूप की अंकवार 
हाँ तुम्हारे आवाज की छुवन 
नदी के भीतर पिघला देती है 
सुखों का पूरा ग्लेशियर ।  

Thursday, April 15, 2010

तुम्हारे नाम का जल



तुम्हारा नाम
अपने अर्थ की आभा में
चमकता है
जैसे अपने नमक के साथ
धीर धरे सागर हो ,
धैर्य की अटूट परम्परा में
तुम्हारे नाम का वजूद
समय के ठोस अँधेरे को भेदकर
रौशनी की तरह फैलता है
और मै कतरा कतरा नहा उठती हूँ ,
तुम्हारे नाम की बारिश में
बिना छतरी के
मै भीगती हूँ ;नंगे पांव ,
साइबेरियन पंछियों की तरह
तुम्हारे नाम का जल
क्यूँ बुलाता है मुझे बार बार
मै चली आती हूँ मीलों मील
बिना रुके बिना थके
तुम्हारे नाम का अर्थ
धारण किये
तुझमे विलीन होने को आतुर
मै सदानीरा .


girl in rain

Wednesday, March 24, 2010

अयोध्या के राम

चौदह कोसी अयोध्या में
आतें हैं तीर्थ यात्री
परिक्रमायें करते हैं नंगे-पांव
उनके पाओं के साथ
चलती है अयोध्या
डोलते है राम
आस्था के जंगल में
छिलते हैं पाओं के छाले
रिसता है खून
तीर्थ यात्री
दुखों की गठरियाँ ढ़ोते हैं सिर पर
उफनती है सरयू
की धो दें उनके पांव
उमगती है हवा
की सुखा दे उनके घाव
पर उनकी परिक्रमा
कल भी अनवरत थी
आज भी अनवरत है
सदियों तक होगी यूँ ही
चौदह कोसी खोज राम की.

Friday, March 12, 2010

चाहना...


मुझे नीड़ नहीं
बस, मुझे थोड़ी सी छांव चाहिए
कोई एक टहनी
या कोई नर्म फुनगी
या फिर आकाश का एक छोटा कोना
तुम्हारे नीले वितान तले
भरनी है मुझको उड़ान

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