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Saturday, July 17, 2010

तुम्हारी बारिश में.......

चाहती हूँ नहाना 
सिर से पाँव तक 
तुम्हारी बारिश में, 
तुम्हारे शब्दों की परतों में 
चाहती हूँ फैल जाना 
शबनमी छुअन बनकर 
उलीच देना है मुझे
उनके बीच समंदर, 
तुम्हारी बाँहों के बादल 
उमड़-घुमड़ कर आए हैं 
तरल गलबांह में प्रिय 
बांध लेना है सकल आकाश,
तुम्हारे अधरों की बूँदें 
बो रहीं रोमांच 
हवा की देह पर 
रोप देना है नदी की धार,
तुम्हारे मन के मेघो में 
इतनी मिठास ! इतनी मिठास ! 
भिगो देना है समूची सृष्टि को 
उसी में दिन रात । 

63 comments:

  1. सचमुच कमाल की रचना है

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  2. कविता नहीं छटपटाहट सही...मुझे कुछ याद हो आया
    कविता रचना मुझे न आता कभी कभी रच जाती कविता..

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  3. रोप देना है नदी की धार,
    तुम्हारे मन के मेघो में
    इतनी मिठास ! इतनी मिठास !
    भिगो देना है समूची सृष्टि को
    उसी में दिन रात ।
    बारिश और प्रेमरस में डूबी मोहक रचना

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  4. रस तो कविता में ऊपर से नीचे तक है और शालीनता गज़ब की..........इसे कहते हैं सब कह कर भी सब छुपा जाना. बधाई.
    आभार सुन्दर रचना पढवाने के लिए

    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  5. भिगो देना है समूची सृष्टि को
    उसी में दिन रात ।

    sumadhur

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  6. ए़क अद्भुत संसार ही रच डाली आपने जिसमे बस प्रेम ही प्रेम है.. रोम रोम में रोमांच है... यह प्रेम और रोमांच दैहिक भी है.. आध्यात्मिक भी है.. मनोवैज्ञानिक भी है...

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  7. बहुत सुन्दर और प्रेम पगी रचना....

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  8. प्रेम रस से सराबोर कविता..!

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  9. हवा की देह पर
    रोप देना है नदी की धार
    बिम्ब शानदार है
    बहुत खूबसूरत और भावपूर्ण

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  10. आपने तो प्रेम में भिगो दिया है , सर से पाँव तक ।
    बहुत खूबसूरत अहसास दिखाया है प्रेम का ।
    सुन्दर रचना ।

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  11. apki kavita ka koi jwab nahi....shabdon ki barsaat me tan man bhig gaya.....congrates

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  12. @ हवा की देह पर
    रोप देना है नदी की धार,
    --- कठिन हुनर है , लेकिन कविता में निहित आत्मविश्वास काबिले-तारीफ़ है ! आभार !

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  13. वाह!! बेहद भावान्त्मक अभिव्यक्ति!! प्रेम रस में डूबी गजब रचना!! बधाई!!

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  14. Behad sundar rachana! Mithas hi mithas hai!

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  15. bahut hi sundar rachna ek purn abhivyakti ke sath ...........

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  16. रश्मिजी -सुन्दर रचना के लिए बधाई.

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  17. बेहद रूमानी होते हुए भी अपनी व्‍याप्ति में यह कविता प्रेम के सौंदर्य और समर्पण के साथ दीन दुनिया से भी गहरा संबंध रखती है, इसीलिए यह कविता प्रेम को एकांतिक से निर्वैयक्तिक बनाती है। यही इसकी विलक्षण बात है। दिल की गहराइयों से बधाई।

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  18. रूमानी सी कोई हवा छूकर गुजर गयी......

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  19. मुरीद हुआ, आप बेजोड़ लिखती है.

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  20. तुम्हारी बारिश यह दो शब्द ही अपने आप मे एक कविता हैं ।

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  21. तरल गलबांह में प्रिय ..khuub sundar prayog

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  22. इतनी मिठास ! इतनी मिठास !
    भिगो देना है समूची सृष्टि को ...न न बारिश ने नहीं..आपकी कविता ने...

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  23. रोप देना है नदी की धार,
    तुम्हारे मन के मेघो में
    इतनी मिठास ! इतनी मिठास !
    भिगो देना है समूची सृष्टि को
    उसी में दिन रात ।

    Beautiful creation !

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  24. चाहती हूँ नहाना तुम्हरी बारिश में ...
    तुम्हारे मन के मेघों में इतनी मिठास ...
    सुन्दर कोमल रूमानी एहसास ...!

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  25. जैसे धरती हि पुकार रही हो - जेठ बिताकर, असाढ़ में!

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  26. बेहतरीन रचना...वाह...
    नीरज

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  27. गहन संवेदनों से ऊख के पोर सी रस भरी कविता पढ़ कर अच्छा लगा. बधाई हो

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  28. रोप देना है नदी की धार,
    तुम्हारे मन के मेघो में
    ...बेहतरीन लिखा ...बधाई.

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  29. तरल गलबांह में प्रिय
    बांध लेना है सकल आकाश
    प्रियतम और प्रकृति मनो एकाकार हों गए हैं ....प्रियतम से एकाकार होने में सम्पूर्ण सृष्टि शामिल हों गयी है मानो .बहुत ही सुन्दर रचना . दिल से बधाई .

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  30. bahut hi shalinata ke saathaapne prem-ras se is kavita ko bhar diya hai.bahut hi gaharai liye shabdo ka chayan karti hai aap.
    poonam

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  31. bahut hi prabhavsaali rachna ....Waah!!!!!!!!!!!

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  32. Aapki kavitayen ek swapnil sansar ka srijan karti hai.yah kavita bhi apwad nahin.shubkamnayen.

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  33. सिर्फ 'आह' लिखूंगी

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  34. शानदार रचना है, कमाल के शब्द हैं, बेहतरीन भाव लिए एक खुबसूरत रचना!!

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  35. तुम्हारे शब्दों की परतों में
    चाहती हूँ फैल जाना ..... sunder rachna. behad romantic...shubhkamna

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  36. तुम्हारे मन के मेघो में
    इतनी मिठास ! इतनी मिठास !
    भिगो देना है समूची सृष्टि को
    उसी में दिन रात ...

    प्रेम को बहुत ही शिद्दत के साथ अभिव्यक्त किया है आपने .... किसी उन्मादी की तरह एकाकार होने को उतावले मन की कसक को बाखूबी शब्दों का आवरण पहनाया है ..... बहुत ही लाजवाब रचना ....

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  37. hi..

    aaj pahli baar aapke blog par aaya..aur ab soch raha hun ki pahle kyon na aaya...

    bahut hi sundar kavita likhi hai aapne...

    Deepak

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  38. "चाहती हूँ नहाना
    सिर से पाँव तक
    तुम्हारी बारिश में,
    तुम्हारे शब्दों की परतों में
    चाहती हूँ फैल जाना
    शबनमी छुअन बनकर" -behad romantic avam makahamaki ahsaso mein pali-badhi rachna.Bahut dino baad aisi kavita padhne ka saubhagy prapt hua.Dhanyawad.

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  39. बहुत सुन्दर रचना ...

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  40. बहुत सुन्दर...

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  41. तुम्हारे मन के मेघो में
    इतनी मिठास ! इतनी मिठास !
    कितनी मिठास ? तुम्हारे पास भी कालिदास के मेघदूत हैं क्या जो चुपके से कानो में कह जाते है !
    इतनी मीठी कविता से रूबरू कराया तुमने ! बहुत बहुत बधाई !

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  42. Bahut achhi pavas rachna. Dhanywad Susheela jee.

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  43. शायद इसे ही कहते हैं अभिव्यक्ति की चरम अवस्था। मन को भिगो जाने वाली रचना।
    …………..
    प्रेतों के बीच घिरी अकेली लड़की।
    साइंस ब्लॉगिंग पर 5 दिवसीय कार्यशाला।

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  44. ‘तस्लीम’ के आँदोलन में सहभागिता के लिए आभार।

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  45. आप सभी का मन की गहराइयों से आभार ।

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  47. बहुत ही सुन्दर रचना है .....धन्यवाद !!

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  48. Bahut sunder Dil ko chhulenewali kavita likhi hai aapne... bahut sunder

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  49. सुशीला जी, "कनुप्रिया" मेरे लिए आज तक की सर्वोत्तम कृति है..कह सकता हूँ कि उसे हज़ारों बार पढ़ा है. "तुम्हारी बारिश में.." पढ़ कर ऐसा लगा क्या कनुप्रिया में से कोई पन्ना फट गया था जिसे किसी ने नहीं जाना !! भई मेरे लिए तो इस कविता के माध्यम से आप धर्मवीर भारती जी के साथ खड़ी हुयी हैं. बहुत बहुत बधाइयाँ.

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  50. bahut hi sunder prem ras se sarobar rachna........

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  51. मन को भिगो गयी ये कविता

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  52. "तुम्हारे शब्दों की परतों में
    चाहती हूँ फैल जाना
    शबनमी छुअन बनकर "
    वाह ! अत्यंत मोहक भाव ! कमाल की रचना !

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  53. man ko bhigoti ek behad khoobsurat rachna !! shubhkamnayen !!

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  54. कोमल भाव ऐसे जैसे कागज़ के बजाय कोई किसी तितली के पंखों पर लिख दे। सुशीला पुरी जी की कवितायें फिर से हमें प्रौढ़ता से सुकुमारता की ओर वापस लौट चलने को विवश कर देती हैं, कुछ पलों के लिए ही सही। प्रेम की बारिश में भीगने का इससे सुखद एहसास और क्या हो सकता है ?

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  55. This comment has been removed by the author.

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