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Saturday, May 29, 2010

मैं बरतती हूँ तुम्हें ऐसे......

मैं बरतती हूँ तुम्हे ऐसे
जैसे
हवा बरतती है सुगंध को
और दूब की नोक से चलकर
पहुचती है शिखर पर ,
मैं बरतती हूँ तुम्हे ऐसे
जैसे
जल बरतता है मिठास को
और घुलकर घनी भूत होकर
मिटाता है युगों की प्यास ,
मैं बरतती हूँ तुम्हे ऐसे
जैसे
धरती बरतती है हरी घास को
और उसकी हरियाली में
लहालोट हो छुपा लेती है चेहरा ,
मैं बरतती हूँ तुम्हे ऐसे
जैसे
उमंगें बरतती है उद्दाम को
और अपनी बाहों में
भर लेना चाहती हैं समूचा आकाश

Thursday, May 6, 2010

तुम्हारी आवाज .......

नदी की लहरों पर 
खुशी की धूप उगती है 
जब वह छूती है 
तुम्हारी आवाज ,
उसकी उदास लहरें 
पहन लेतीं हैं तुम्हारी महक 
नदी नहाती है अपनी ही 
भूली बिसरी चाहतें ,
भीग जाती है नदी 
उस धूप की मिठास में  
स्थगित धुनें सुर साध लेती हैं 
और नदी उस सरगमी नमी मे 
उमगकर डूब जाती है ,
बर्फीले सपनों को मिलती है 
नरम धूप की अंकवार 
हाँ तुम्हारे आवाज की छुवन 
नदी के भीतर पिघला देती है 
सुखों का पूरा ग्लेशियर ।  

Thursday, April 15, 2010

तुम्हारे नाम का जल



तुम्हारा नाम
अपने अर्थ की आभा में
चमकता है
जैसे अपने नमक के साथ
धीर धरे सागर हो ,
धैर्य की अटूट परम्परा में
तुम्हारे नाम का वजूद
समय के ठोस अँधेरे को भेदकर
रौशनी की तरह फैलता है
और मै कतरा कतरा नहा उठती हूँ ,
तुम्हारे नाम की बारिश में
बिना छतरी के
मै भीगती हूँ ;नंगे पांव ,
साइबेरियन पंछियों की तरह
तुम्हारे नाम का जल
क्यूँ बुलाता है मुझे बार बार
मै चली आती हूँ मीलों मील
बिना रुके बिना थके
तुम्हारे नाम का अर्थ
धारण किये
तुझमे विलीन होने को आतुर
मै सदानीरा .


girl in rain

Wednesday, March 24, 2010

अयोध्या के राम

चौदह कोसी अयोध्या में
आतें हैं तीर्थ यात्री
परिक्रमायें करते हैं नंगे-पांव
उनके पाओं के साथ
चलती है अयोध्या
डोलते है राम
आस्था के जंगल में
छिलते हैं पाओं के छाले
रिसता है खून
तीर्थ यात्री
दुखों की गठरियाँ ढ़ोते हैं सिर पर
उफनती है सरयू
की धो दें उनके पांव
उमगती है हवा
की सुखा दे उनके घाव
पर उनकी परिक्रमा
कल भी अनवरत थी
आज भी अनवरत है
सदियों तक होगी यूँ ही
चौदह कोसी खोज राम की.

Friday, March 12, 2010

चाहना...


मुझे नीड़ नहीं
बस, मुझे थोड़ी सी छांव चाहिए
कोई एक टहनी
या कोई नर्म फुनगी
या फिर आकाश का एक छोटा कोना
तुम्हारे नीले वितान तले
भरनी है मुझको उड़ान

Saturday, February 20, 2010

पात्रता



मै ऐसे लोक मे आ गई हूँ
जिसका ईश्वर और नागरिक
सिर्फ एक है
उसकी अंतहीन सीमाओं मे
मेरा वजूद
ले चुका है प्रवेश
बिना किसी प्रवेशपत्र के
जहाँ परिभाषाएं नदारद हैं
शब्द अनुपस्थित हैं और
उस अदृश्य धारावाहिक में
मेरी पात्रता युगों से तय है
वहाँ न कथानक है
न ही कोई संवाद
वहाँ समूची कथा कह रहा है
हमारे तुम्हारे मध्य का मौन .

(दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित )

Sunday, February 7, 2010

एक छाँव

मेरे प्रेम की गठरी में
थोड़े शब्द हैं
तो ढेर सारा मौन है
कुछ उदासियाँ हैं
तो अनंत हसीं है
मेरी इस गठरी में
दुबकी है कई अजन्मीं खुशियाँ,
मेरे प्रेम की गठरी में
कच्चे-पक्के रास्ते हैं
तो जंगली पगडंडियाँ भी हैं
मेरे वहाँ कस्तूरी बस्ती है
वन-वन भटकती नहीं
मेरे पास
मृगछौने सा समय करता है किलोल,
मेरे प्रेम की गठरी में
चुटकी भर ठिठुरन है
तो अंजुरी भर धूप है
मेरी इस पोटली में
एक ऐसी छीनी है
जिससे हो सकता है आसमान में सुराख,
मेरे प्रेम की गठरी में
एक छाव है जहां
सुस्ताता है उस पार का बटोही
मेरे यहाँ हुआ करती हैं
तृप्ति की कई-कई नदियाँ
मेरे पास लहरों की पूरी कथा है
मैंने अपनी गठरी में बाँधा है
एक नई धरती एक नया आसमान।
( लखनऊ दूरदर्शन से प्रसारित )

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