
मै ऐसे लोक मे आ गई हूँ
जिसका ईश्वर और नागरिक
सिर्फ एक है
उसकी अंतहीन सीमाओं मे
मेरा वजूद
ले चुका है प्रवेश
बिना किसी प्रवेशपत्र के
जहाँ परिभाषाएं नदारद हैं
शब्द अनुपस्थित हैं और
उस अदृश्य धारावाहिक में
मेरी पात्रता युगों से तय है
वहाँ न कथानक है
न ही कोई संवाद
वहाँ समूची कथा कह रहा है
हमारे तुम्हारे मध्य का मौन .
(दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित )
सटीक रचना !!
ReplyDeleteभीड़ में तन्हाईयाँ ...पीछा करती हैं खामोशियाँ ..तब मौन बोलता है-- jise शब्द की / परिभाषा की ज़रूरत ही नहीं होती.
ReplyDeleteभावों में डुबो दिया आप ने.
बहुत सहज और संवेदनशील काव्यभाव। हिन्दुस्तान में छपने वाली बात को कविता के बाद एक स्पेस देकर रखती तो ज्यादा ठीक लगता।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति!
ReplyDeletemanbhavan.narayan narayan
ReplyDeleteदो लोगों के मध्य के मौन ने प्रेम का अनंत उजाला रच दिया है .प्रेम की दिव्य रोशनी से भरपूर जगमग है ईश्वर की यह दुनिया . तुमने तो प्रेम का महाकाव्य ही रच दिया है तुम्हें बहुत बधाई !!!
ReplyDeleteगाढ़ी कविता.
ReplyDeleteवहाँ न कथानक है
ReplyDeleteन ही कोई संवाद
वहाँ समूची कथा कह रहा है
हमारे तुम्हारे मध्य का मौन...
ये सच है की मौन की भी भाषा होती है ... जो गहरे दिल से गहरे दिल को ही समझ आती है ... इस मौन की चीख कई बार जिंदगी भर गूँजती रहती है अपने अंदर ही ....
बहुत गहरी रचना है .. लाजवाब ...
बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति!
ReplyDelete..वहाँ समूची कथा कह रहा है
ReplyDeleteहमारे तुम्हारे मध्य का मौन .
..बहुत अच्छी कविता.
कथा कहता हुआ मौन बहुत ही सुन्दर बिम्ब है यह ।
ReplyDeletegehan bhav se bhari rachna..
ReplyDeleteवहाँ समूची कथा कह रहा है
ReplyDeleteहमारे तुम्हारे मध्य का मौन!!!
युगों युगों से यह मध्य का मौन ही
तो सारी कथाएं कह रहा है !अव्यक्त को व्यक्त करने वाला बिम्ब बहुत सुंदर है !
इसकी पकड़ और गहरी हो ,बधाई स्वीकार करो !!!
कविता जिस भावना से लिखी जाये पाठक उस भावना को दिल से महसूस कर ले तो मेहनत सफल हो जाती है सफलता पर बहुत बहुत
ReplyDeleteबधाई
ये अद्भुत है.
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ReplyDeleteअहा, अति सुन्दर
ReplyDeleteआदरणीया,
ReplyDeleteमेरी पात्रता युगों से तय है
वहाँ न कथानक है
न ही कोई संवाद
वहाँ समूची कथा कह रहा है
हमारे तुम्हारे मध्य का मौन . .....ह्रदय स्पर्शी रचना का आभार .......
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई
जिसका ईश्वर और नागरिक सिर्फ एक है एक व्यक्ति एक पद के नियम के अनुसार?
ReplyDeleteसुन्दर! अति सुन्दर!!
इतने दिन से आपने कुछ लिखा नहीं? लिखिये भी!
सकी अंतहीन सीमाओं मे
ReplyDeleteमेरा वजूद
ले चुका है प्रवेश
बिना किसी प्रवेशपत्र के
जहाँ परिभाषाएं नदारद हैं
शब्द अनुपस्थित हैं और
उस अदृश्य धारावाहिक में
मेरी पात्रता युगों से तय है
मैं मौन हूँ क्यों कि शब्द साथ नहीं दे रहें हैं अभिव्यक्ति के लिए....
वहाँ समूची कथा कह रहा है
ReplyDeleteहमारे तुम्हारे मध्य का मौन .
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति! शब्द नही है मेरे पास इन्हे केहने के लिये
आप सभी का हार्दिक आभार .........
ReplyDeleteपरिभाषाएं नदारद हैं शब्द अनुपस्थित हैं... मध्य का मौन फिर भी चीख रहा है... सत्य की अभिव्यक्ति को कोइ रोक पाया है भला?
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ReplyDelete"मै ऐसे लोक मे आ गई हूँ
ReplyDeleteजिसका ईश्वर और नागरिक
सिर्फ एक है"
सिर्फ़ बढिया कहना नही आ रहा और कुछ कह नही पा रहा हू... बहुत सुन्दर कविता है...