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Saturday, February 20, 2010

पात्रता



मै ऐसे लोक मे आ गई हूँ
जिसका ईश्वर और नागरिक
सिर्फ एक है
उसकी अंतहीन सीमाओं मे
मेरा वजूद
ले चुका है प्रवेश
बिना किसी प्रवेशपत्र के
जहाँ परिभाषाएं नदारद हैं
शब्द अनुपस्थित हैं और
उस अदृश्य धारावाहिक में
मेरी पात्रता युगों से तय है
वहाँ न कथानक है
न ही कोई संवाद
वहाँ समूची कथा कह रहा है
हमारे तुम्हारे मध्य का मौन .

(दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित )

25 comments:

  1. भीड़ में तन्हाईयाँ ...पीछा करती हैं खामोशियाँ ..तब मौन बोलता है-- jise शब्द की / परिभाषा की ज़रूरत ही नहीं होती.
    भावों में डुबो दिया आप ने.

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  2. बहुत सहज और संवेदनशील काव्यभाव। हिन्दुस्तान में छपने वाली बात को कविता के बाद एक स्पेस देकर रखती तो ज्यादा ठीक लगता।

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  3. बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति!

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  4. दो लोगों के मध्य के मौन ने प्रेम का अनंत उजाला रच दिया है .प्रेम की दिव्य रोशनी से भरपूर जगमग है ईश्वर की यह दुनिया . तुमने तो प्रेम का महाकाव्य ही रच दिया है तुम्हें बहुत बधाई !!!

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  5. वहाँ न कथानक है
    न ही कोई संवाद
    वहाँ समूची कथा कह रहा है
    हमारे तुम्हारे मध्य का मौन...

    ये सच है की मौन की भी भाषा होती है ... जो गहरे दिल से गहरे दिल को ही समझ आती है ... इस मौन की चीख कई बार जिंदगी भर गूँजती रहती है अपने अंदर ही ....
    बहुत गहरी रचना है .. लाजवाब ...

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  6. बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति!

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  7. ..वहाँ समूची कथा कह रहा है
    हमारे तुम्हारे मध्य का मौन .
    ..बहुत अच्छी कविता.

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  8. कथा कहता हुआ मौन बहुत ही सुन्दर बिम्ब है यह ।

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  9. वहाँ समूची कथा कह रहा है
    हमारे तुम्हारे मध्य का मौन!!!
    युगों युगों से यह मध्य का मौन ही
    तो सारी कथाएं कह रहा है !अव्यक्त को व्यक्त करने वाला बिम्ब बहुत सुंदर है !
    इसकी पकड़ और गहरी हो ,बधाई स्वीकार करो !!!

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  10. कविता जिस भावना से लिखी जाये पाठक उस भावना को दिल से महसूस कर ले तो मेहनत सफल हो जाती है सफलता पर बहुत बहुत
    बधाई

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  11. ये अद्भुत है.

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  12. This comment has been removed by the author.

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  13. अहा, अति सुन्दर

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  14. आदरणीया,
    मेरी पात्रता युगों से तय है
    वहाँ न कथानक है
    न ही कोई संवाद
    वहाँ समूची कथा कह रहा है
    हमारे तुम्हारे मध्य का मौन . .....ह्रदय स्पर्शी रचना का आभार .......
    अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई

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  15. जिसका ईश्वर और नागरिक सिर्फ एक है एक व्यक्ति एक पद के नियम के अनुसार?

    सुन्दर! अति सुन्दर!!

    इतने दिन से आपने कुछ लिखा नहीं? लिखिये भी!

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  16. सकी अंतहीन सीमाओं मे
    मेरा वजूद
    ले चुका है प्रवेश
    बिना किसी प्रवेशपत्र के
    जहाँ परिभाषाएं नदारद हैं
    शब्द अनुपस्थित हैं और
    उस अदृश्य धारावाहिक में
    मेरी पात्रता युगों से तय है

    मैं मौन हूँ क्यों कि शब्द साथ नहीं दे रहें हैं अभिव्यक्ति के लिए....

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  17. वहाँ समूची कथा कह रहा है
    हमारे तुम्हारे मध्य का मौन .

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति! शब्द नही है मेरे पास इन्हे केहने के लिये

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  18. आप सभी का हार्दिक आभार .........

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  19. परिभाषाएं नदारद हैं शब्द अनुपस्थित हैं... मध्य का मौन फिर भी चीख रहा है... सत्य की अभिव्यक्ति को कोइ रोक पाया है भला?

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  21. "मै ऐसे लोक मे आ गई हूँ
    जिसका ईश्वर और नागरिक
    सिर्फ एक है"

    सिर्फ़ बढिया कहना नही आ रहा और कुछ कह नही पा रहा हू... बहुत सुन्दर कविता है...

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