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Thursday, July 21, 2011

जब पहली बार मिले थे हम

थर -थर काँपती 
लिपियों के बीच  
मिले थे हम, 
तुमने मुझे 
मेरे नाम से पुकारा था 
बिल्कुल धीमे 
लगभग फुसफुसाकर 
और उन्ही दुबली लिपियों से 
रचा था हमने महाकाव्य ,
भाषा के मौन घर में 
छुप गए थे हम 
डरे हुये परिंदों की तरह 
चहचहाना भूलकर 
बस देखना ही शेष था,
अगल बगल बैठे थे 
पर दूर कहीं खोये थे 
एक दूसरे के सपनों में ,
सपनों के भीतर 
आत्मा की आँच थी                        
ताप रहे थे जिसे 
दोनों हथेलियाँ फैलाए 
समय की बीहड़ उड़ानों में ,
मेरी त्वचा पर 
खुदा था तुम्हारा नाम 
जिसे पहचान गए थे तुम 
उस एक ही अक्षर में...  
जन्मों के गीत रचे थे 
एकांत के  रंगों में 
जिसे हम गा रहे थे 
चुप्पियों के बीच, 
सरगम की यात्रा 
धुनों की बारिश में 
भीग गए थे हम 
बाँसुरी के स्वरों में, 
ठीक उसी वक्त 
क्रोंच-बध हुआ था 
लहूलुहान हुई थी धरती 
और टूटती साँसों के बीच 
जन्मे थे बुद्ध ...। 

49 comments:

  1. बाँसुरी के स्वरों में,
    ठीक उसी वक्त
    क्रोंच-बध हुआ था
    लहूलुहान हुई थी धरती
    और टूटती साँसों के बीच
    जन्मे थे बुद्ध ...।

    बेहतरीन कविता।

    सादर

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  2. Didi Ji Sadar Pranam,
    dil ko chu gayi aapki behtreen rachna.......

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  3. आज 19- 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


    ...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
    ____________________________________

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  4. sunder prastutikaran.

    shubhkamnayen

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  5. भावमय करते शब्‍दों के साथ सुन्‍दर प्रस्‍तुति ... ।

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  6. दिनांक गलत होने के कारण फिर से सूचित कर रही हूँ ..


    आज 22- 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


    ...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
    ____________________________________

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  7. अत्यंत भावपूर्ण रचना .

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  8. खूबसूरत भावों को समेटे एक खूबसूरत रचना |

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  9. आपकी कवि‍ता अनहद नाद की तरह है।

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  10. बहुत ही खुबसूरत अभिवयक्ति....

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  11. भाषा के मौन घर में ......बेहद खूबसूरत

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  12. कमाल का शिल्प है इस रचना का!

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  13. bahut hi khoosoorat rachna.........

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  14. एकांत के रंगों में
    जिसे हम गा रहे थे
    चुप्पियों के बीच,
    सरगम की यात्रा
    धुनों की बारिश में
    भीग गए थे हम

    भावों की गहनता लिए बहुत अच्छी रचना ...

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  15. उस एक ही अक्षर में...
    जन्मों के गीत रचे थे

    बहुत सुन्दर रचना, खूबसूरत अभिव्यक्ति , बधाई

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  16. namaskaar !
    sunder abhivyakti , sunder prastuti . badhai
    sadhuwad
    saadar

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  17. लिपियों के बीच
    मिले थे हम,
    तुमने मुझे
    मेरे नाम से पुकारा था
    बिल्कुल धीमे
    लगभग फुसफुसाकर
    खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  18. "भाषा के मौन घर में
    छुप गए थे हम
    डरे हुये परिंदों की तरह
    चहचहाना भूलकर
    बस देखना ही शेष था," एक और खूबसूरत कविता। कितनी महीन और मार्मिक बुनावट है अंतरंग मानवीय भावों की। बधाई सुशीलाजी।

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  19. व्‍याकरण की शब्‍दावली में सघन प्रेम की यह शानदार कविता आपकी लेखनी ही से निकल सकती थी। बधाई और शुभकामनाएं।

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  20. पर वो भी तो प्रेम की मौन भाषा से ही उपजे थे ... प्रेम जिसकी कोई भाषा नहीं होती ... जो सृजन करती है प्रेम का ...
    अध्बुध प्रस्तुति है ...

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  21. aisi rachna ke liye badhai aur shubhkamnayen.
    aakarshan

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  22. सुन्दर कविता...बहुत पसंद आई..

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  23. .
    जन्में थे बुद्ध ...............
    कुछ समय को थम गया था क्रौंच -वध ,
    किन्तु गैरिक रंग के नेपथ्य में
    वह वधिक जीता रहा था ,
    हिमाच्छादन के तले
    दरारों के बीच बहती ही रही
    श्याम-अंतर-धार ....................!

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  24. ठीक उसी वक्त
    क्रोंच-बध हुआ था
    लहूलुहान हुई थी धरती
    और टूटती साँसों के बीच
    जन्मे थे बुद्ध ...

    बेहद खूबसूरत...

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  25. मेरी त्वचा पर
    खुदा था तुम्हारा नाम
    जिसे पहचान गए थे तुम

    यह तो मन को वैसे ही छू गया जैसे जंगली हवा उतर जाती है मन की भीतरी तहों में
    कहीं . बधाई

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  26. क्या कहूँ?मन आनंदित हुआ। रूहानी अल्फाजों से भरी
    सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  27. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  28. उस एक ही अक्षर में...
    जन्मों के गीत रचे थे ..

    वाह! बेहद कोमल से भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  29. बहुत बढ़िया कविता... बधाई...

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  30. सचमुच आपने बहुत अच्छी कविता लिखी है दीदी कविता लिखने मे आपका कोई सानी नही है

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  31. थर -थर काँपती
    लिपियों के बीच
    मिले थे हम,
    तुमने मुझे
    मेरे नाम से पुकारा था
    बिल्कुल धीमे
    लगभग फुसफुसाकर
    और उन्ही दुबली लिपियों से
    रचा था हमने महाकाव्य ,

    _______________________


    बेहतरीन अनुभूति

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  32. bhasha ke moun ghar me

    mnn krne ko prerit krti ek hi pnkti bhut hai
    puri kvita ke khne hi kya .

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  33. भीग गए थे हम बाँसुरी के स्वरों में !

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  34. आप सभी का दिल से आभार !

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  35. jab tak bachogi
    aise hi rachogi

    Jis din 'mar' jaaogi
    apne ghar laut aaogi...
    naha-dhokar...
    aur us se pahle jaane kahaan-kahaan
    kya-kya toh bo-bo kar...

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  36. आज आपके ब्लॉग पर आपकी रचनाओं का आस्वादन किया. बहुत गहरे मन को छूती हुई रचनाएँ. प्रेम का यह धीमापन ही भिगोता है. सुन्दर रचनाओं के लिए बधाई.

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  37. भावनाओ के ज्वार को बहुत खूबसूरती से शब्दों के दायरे में बांध कर कर अच्छी कविता लिखी है.
    यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
    अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

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  38. aapki kavitao ne dil ko chhu liya. aap badhai ki patr hai.

    m shiva

    www.kaalamita.com

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  39. bahut hi sundar kavita hai sushila ji.........

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  40. दीदी बहुत बढ़िया लगी आपकी कविता .बस इसी तरह साहित्य जगत को अपनी रौशनी से चमत्कृत करते रहें .. धन्यवाद

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  41. प्रेम अब बीता हुआ भाव बन चुका है/ आप की यह कविता बताती है यह सच नही है/मिथक का अच्छा प्रयोग है/ ऐसी कविताये ह्मे यकीन देती है

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