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Monday, August 1, 2011

चिट्ठी


वह लिखता है-- 
वहाँ बारिश हो रही है 
और मै भीगती हूँ यहाँ 
अहर्निश...,
वह लिखता है-- 
मै जल्द ही बात करूँगा 
और मेरी आत्मा नहा उठती है 
जैजैवन्ती की धुनों से...,
वह लिखता है-- 
कुछ मुश्किलें हैं 
और मै बाँहें फैलाकर 
बटोर लेना चाहती हूँ 
उसके सारे दुःख...,
वह लिखता है-- 
मै मिलने आऊँगा 
और मै थिरकती हूँ 
पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक...।

35 comments:

  1. यह पराकाष्‍ठा है प्रेम की, जिसमें बांहें फैलाकर बुलाती एक खोई हुई स्‍त्री एक पुरुष के दुखों को अपना बना लेती है। ... अनंत हैं उस स्‍त्री के दुख और अनंत हैं उसकी कामनाएं... पर प्रेम है कि अनंत है और सब चीजों से...लाजवाब और बेमिसाल..

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  2. अद्भुत प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति!!

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  3. सुन्दर...'मर्मस्पर्शी'

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  4. सच में बहुत बहुत खुबसूरत....

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  5. बहुत खुबसूरत.. अभिव्यक्ति!!

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  6. बहुत सुन्दर 'मर्मस्पर्शी' अभिव्यक्ति|

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  7. वह लिखता है--
    मै मिलने आऊँगा
    और मै थिरकती हूँ
    पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक...।
    manmohak

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  8. मान के कोमल भावों को उकेरा है .. सुन्दर अभिव्यक्ति

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  9. बेहतरीन।
    --------
    कल 03/08/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  10. गज़ब गज़ब गज़ब्……………
    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  11. मै मिलने आऊँगा
    और मै थिरकती हूँ
    पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक...


    sundr abhivakti ....

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  12. prem me anubhuti ki ga hvarta hoti hai, kisi ka apna banane se adhik prasannta kisi ka ho jane me hai ! aapki kavita se isee bhav ka bodh ho raha hai ! shubh pranam !

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  13. निर्दोष भाव... अच्छी कविता..बधाई...

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  14. to understand poetry is quite difficult for me ,but your this poetry really appeals.

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  15. अच्छा शब्द साधती हैं आप, पढ़ कर ठहर सा गया.

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  16. prem prem prem me nhai ek kavita... sundar sundar sundar

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  17. tum likhti ho vha
    mai mhsoos krti hun yahan
    pati isi ko khte hai .

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  18. .



    आदरणीया सुशीला पुरी जी
    सादर अभिवादन !

    बहुत दिन बाद आ पाया हूं … आ'कर लौटना कठिन हो रहा है ।
    आपकी पिछली कई न पढ़ी जा सकी रचनाएं एक साथ पढ़ी हैं … एक अलग दुनिया में विचर रहा हूं …

    …और प्रस्तुत रचना के द्वारा उपस्थिति मात्र अंकित कर रहा हूं
    वह लिखता है--
    मै जल्द ही बात करूँगा
    और मेरी आत्मा नहा उठती है
    जैजैवन्ती की धुनों से...,
    ...
    ....
    वह लिखता है--
    मै मिलने आऊँगा
    और मै थिरकती हूँ
    पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक...


    आपके यहा जब भी आया … भाव और शिल्प सौंदर्य के संगम में तीर्थ-स्नान कर के ही लौटा हूं …

    चंद शब्दों के सहारे एक विराट कविता रच देने की आपकी फ़नकारी को हृदय से नमन !


    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  19. बहुत खूबसूरत प्रेम अभिव्यक्ति ।

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  20. nari ke nishchal pyar ki sunder abhivyakti....

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  21. बहुत सुन्दर ,सुशीला जी ! जब कोई हमारा सर्वस्व हो जाता है तो हमारा हर बर्ताव उसी के अनुसार होने लगता है ! प्यारी कविता !

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  22. पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ...महसूस हुआ कि प्रेम है तो यहीं है...प्रेममयी ब्लॉग़ पर प्रेम से भीगी रचनाएँ....!!

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  23. वह लिखता है--
    वहाँ बारिश हो रही है
    और मै भीगती हूँ यहाँ
    अहर्निश...,
    kya gazab ki soch hai......very good.

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  24. इससे ज्यादा अभी कुछ नहीं कहा जा सकता कि दिल का एक हिस्सा आपके नाम किया .
    प्रणाम स्वीकारें .
    सादर
    -बाबुषा

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  25. इस क्षण मुझे आप पर इतना प्रेम आ रहा है कि मैं कहीं कि मलिका होती तो पूरी रियासत आपके नाम कर देती..! सच ! कितना सुंदर लिखा है ..
    मैं एक दिन आउंगी वहाँ..और पूरा दिन बिता डालूंगी आपकी छाँव में ...सब पहले का भी पढ़ डालूंगी ..!
    एक नदी बह रही है जिसमें मुझ जैसे को डूब जाना चाहिए !
    चलती हूँ .
    शुभ रात्रि
    -बाबुषा

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  26. वह लिखता है--
    मै मिलने आऊँगा
    और मै थिरकती हूँ
    पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक...।
    bahut sundar Sushila ...
    meetha hamesha ki trah..

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  27. ....... और बहुत ही सधा हुआ ! सच्मुच आज मैंने एक कविता पढ़ी !

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  28. उम्दा सोच
    भावमय करते शब्‍दों के साथ गजब का लेखन ...आभार ।

    पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ

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  29. उम्दा लेखन ....

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  30. Bahut hi umda prastuti... Aabhar...

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  31. अति सुंदर रचना..धन्यवाद आपको । देव की कृपा यूँ ही आप पर बनी रहे.

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