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Tuesday, January 25, 2011

आवाज़ की बूँद...

स्वर्गीय पंडित भीमसेन जोशी जी के अद्भुत सुरों को समर्पित अपनी एक कविता ....


खुशी के आदिम उद्घोष सी
गूँजती है तुम्हारी आवाज़
मेघ बनकर फूँकती है
मन मे मल्हार
बूँदों सी झरती है देह पर
नेह ही नेह ,
रक्तकोशिकाओं के पाँवों में
बंध जाते हैं रुनझुन घुंघरू
अनगिन छंदों में गूँथकर आह्लाद
हवाएँ कर देती हैं अभिषेक
और वापस लौट आती है
हंसी , साँसों की ,
चुप्पियाँ चुपचाप चुन लेती हैं
खण्डहरों के खोह
स्वप्न जगते हैं...कि पलकें ढाँप लेते हैं
तुम्हारी आवाज़ की बरखा
खींच लाती हैं गगन से रश्मियाँ
खिली गीली गुनगुनी सी धूप
जिसे ओढ़ती हूँ मै
ज्ञात नहीं सदियों सदियों से
सुर तुम्हारे जी रहे मुझको
कि मै ही ले रही हूँ जन्म फिर फिर ...!   

Saturday, December 25, 2010

रात में छूट गया हारमोनियम

मेरे प्रिय रचनाकार की मेरी प्रिय कविता ----


मै हारमोनियम रात के भीतर बजा रहा था 
गाना जो था वह अँधेरे में इतनी दूर तक जाता था 
कि मै देख नहीं पाता था ,
फिर एक पतली-सी दरार मुझे दिखी 
मै उसमें घुस गया 
और अँधेरे की दो परतों के बीच नींद में डूबे पानी जैसा 
दूर तक दौड़ने लगा ,
वहाँ बीस साल से एक लड़की थी , जो बिना कभी दिखे 
सोती जा रही थी 
वह जागी तो नहीं लेकिन नींद में ही हँसी ,
अँधेरे में गाना था और पानी जैसा जो बह रहा 
वह मैं था ,
फिर तो मैं भी हँसने लगा रात में ही 
अँधेरे में छुपा हुआ ,
एक मोटा अधेड़ उम्र का आदमी 
साईंबाबा की फोटो के नीचे पिस्ता खा रहा था 
उसने बंदूक से मुझे डराया 
यों आँखें फाड़कर और मुँह को यूँ -यूँ करके ,
वह तो बाप निकला लड़की का ,जो गुस्से में था 
और सो भी नहीं रहा था बीस साल से 
लड़की के सपनों की पहरेदारी में 
मै क्या करता ? धप्प से कूदकर बाहर निकल आया 
और उजाले में डरावने आदमी से नमस्ते करने लगा ,
लेकिन मेरा हारमोनियम तो 
रात में ही रह गया था ,बहुत पीछे 
और वह बज रहा था 
और लड़की हँसे क्यों जा रही थी 
यह कहना मुश्किल था ।  

Monday, December 13, 2010

अम्मा

आज जब पिता नहीं हैं 
अम्मा कुछ ज्यादा ही 
जोड़ -घटाव करती हैं 
रात-दिन, उन दिनों का, 
पिता की चौहद्दी में 
वे कभी भारहीन, भयमुक्त न थीं 
वहाँ मुकदमों की अनगिनत तारीखें थीं 
या फिर फसल की चिंताएँ 
बुहारते ही बीता उन्हे -
अनिश्चय , अकाल,
हाँ, जब -जब नाना आते थे 
जरूर तब हंसती थीं अम्मा 
वेवजह भी ओढ़े रहती थीं मुस्कान 
पिता भी तब बरसते नहीं थे उनपर 
कुछ दिन संतुलित रहती थी हवा 
थोड़े दिनों के लिए ही सही 
अम्मा को भी अपना नाम याद रहता था ,
उन्हे याद आती है -
पीतल की वह थाली 
जिसे पटक दी थी पिता ने 
दाल मे नमक ज्यादा होने पर 
अब भी गूँजती रहती है घर में 
थाली के टूटने की आवाज़ 
उन टुकड़ों को अब भी 
जब -तब बीनती रहती हैं अम्मा ...।   

Monday, November 22, 2010

इस बार .........

इस बार 
जब आयेगा वसंत 
तो बस 
तुम्हारे लिए 
वसंत की हवा 
वसंत की धूप 
वसंत की  नमी 
वसंत की चाँदनी 
सब कुछ होगी 
तुम पर न्योछावर 
जितने भी फूल 
खिलेंगे इस बार 
सबके सब 
तुम गूँथ देना मेरी चोटी मे 
उन फूलों की पूरी सुगंध 
करेगी यात्रा
बस  
तुम्हारे सांसों की । 

Thursday, October 28, 2010

याद

याद आई ऐसे 
जैसे, हवा आई चुपके से 
और रच... गई साँस ,
बिना किसी आहट के 
जैसे, दाखिल हुई धूप 
कमरे मे 
और भर गई उजास ,
जैसे खोलकर पिंजड़ा 
उड़ गया पंक्षी 
आकाश मे 
और पंखों मे समा गया हो 
रंग नीला- नीला ,
जैसे, झरी हो ओस 
बिल्कुल दबे पाँव 
और पसीज गया हो 
मन का शीशा 
उजली सी दिखने लगी हो 
पूरी दुनिया.....,
जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण 
और धरती की तरह गोल 
माँ की कोख मे 
मचला हो नृत्य के लिए ....!

Saturday, October 2, 2010

उपस्थिति

तुम नहीं थे 
तब भी थे तुम 
स्पर्श की धरा पर 
हरी घास से 
बीज के भीतर
वृक्ष थे तुम ,
बाँसुरी से 
अधर पर 
नहीं थे तुम 
तब भी थे 
अमिट राग से ,
मौन के आर्त पल मे 
स्वरों का हाथ थामे 
व्याप्त थे पल पल 
शब्द पश्यन्ती 
महाकाव्य से ....!  

Wednesday, September 8, 2010

पावस रोज ही

भीगना 
सिर्फ पावस में ही नहीं होता  
उसकी बातें  
भिगोती हैं  
रोज ही  
धरती की तरह  
धानी चूनर  
ओढ़ लेती हूँ मैं । 

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