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Wednesday, January 20, 2010

वसंत के लिए


यदि ला सको तो
ला देना
अपनी अनुपस्थिति का अंजन
अपने स्पर्श का पीत- वसन
अपनी दृष्टि का अंगराग
साथ में लाना
कुछ फूल स्मित के
वसंत के लिए ,
ला सको तो
लाना
अपनी बांहों का कंठहार
अपने चुम्बनों का गीत
सहमे समय के लिए
धडकनों की निर्द्वंद धुन
और ढेर सारी उम्मीद भी
वसंत के लिए ,
कुछ जगह बनाकर
जरुर लाना
ठूंठ हुई उम्र के लिए
नई नर्म कोंपलें
अंधेरों के लिए
थोडा सा सूरज
तपते वक्त के लिए
थोड़ी सी चांदनी
लाना
वसंत के लिए .

Saturday, December 19, 2009

मेरे हिस्से की मिठास

मेरे मन के समंदर में
ढेर सारा नमक था
बिलकुल खारा
स्वादहीन
उन नोनचट दिनों में
हलक सूख जाता थी
मरुस्थली समय
जिद्द किये बैठा था
नन्हें शिशु सी मचलती थी प्यास
मोथे की जड़ की तरह
दुःख दुबका रहता था भीतर
उन्ही खारे दिनों में
समंदर की सतह पर
मेरे हिस्से की मिठास लिए
छप-छप करते तुम्हारे पांव
चले आये सहसा
और नसों में घुल गया चन्द्रमा .

Thursday, November 12, 2009

इस असंभव समय में

मेरी प्यास
गहरे समंदर में उतर जाती है
जब कहते हो तुम
आओ !
आ जाओ पास ,
नभ का अनंत विस्तार लिए
मेरी निजता
दुबक जाती है
तुम्हारी गोद में
और कई कई आंखों से
देखती हूँ तुम्हे
अनयन होकर ,
तुम्हारी लय पर
थिरकती हूँ मै
देह में विदेह होकर
और पोर पोर पर
मुस्कराते हो तुम
नियम से बेनियम होकर ,
आदिम धुनों में
तुम्हारा अनहद नाद
बजता है मुझमे
और उठती है हिलोर
इस असंभव समय में .

Friday, October 23, 2009

सिर्फ़ बचे तुम


आंकडों में लिपटा
तुम्हारा प्रेम
जोड़ते घटाते रहे तुम
शेष बचता रहा हर बार
पर मेरे लिए प्रेम
दो मिलकर एक बना
और एक दिन
एक भी समा गया शून्य में
सिर्फ़ बचे तुम

Monday, October 5, 2009

तुम्हारा चुम्बन

तुम्हारा वह चुम्बन
जिसमे घुली होती है
ईश्वर की आँख

झंकृत करती रहती है

अनवरत

मेरे जीवन के तार

उसमे भीगा होता है

पूरा का पूरा समुद्र

पूनम के चाँद को समेटे

नहा लेती हूँ मै
अखंड आद्रता

चांदनी ओढ़ कर
वहां विहँसता है बचपन
और घुटनों के बल
सरकता है समय
अपनी ढेर सारी
निर्मल शताब्दियों के साथ
सहेज लेती हूँ उसे
जैसे सहेजती है मां
पृथ्वी की तरह
अपनी कोख
.

Monday, September 14, 2009

तुमने लिखा............

तुमने लिखी
धरती
और वह हरी हो गई
तुमने आकाश लिखा
और वह नीला हो गया
तुमने सूरज लिखा
और वह छुप गया बादलों की ओट
तुमने चाँद लिखा
वह मुस्कराता रहा रात भर
तुमने हवा लिखी
नहा लिया उसने चंदन पराग
तुमने मुझे ही तो लिखा
बार-बार
लगातार

Thursday, August 20, 2009

उसकी खोज


वह खोजती है
उन शब्दों का साहचर्य
जहाँ आत्मा के पार का संसार
जीवित होता है,
और बांधता है पूरा आकाश,
वह खोजती है
उन क्षणों का सौन्दर्य
जहाँ शब्दों के बीच का मौन
महाकाव्य रचता है
सरल संस्तुतियों के साथ,
वह खोजती है
उन आत्मीय संबोधनों के स्वर
जहाँ पीड़ा भी संवरती है
निर्वसन निराकार,
वह खोजती है
उस तोष के कुछ सूत्र
जहाँ अथाह एकांत में
किया था उसने
मोक्ष से सहवास

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