
तुमने पूछा था
क्या बचपन से तुम
इसी तरह रोती रही हो !
और सोचने लगी मै
उस समय के बारे में
जब हम
बिना रोये हुआ करते थे
रोने की जगह
हंसना होता था तब;
बात- बेबात बस
हँसते जाते पागलों की तरह
और हमारी हंसी में
शामिल हो जाती थी
पूरी दुनिया,
हँसने की जगह तब
रोना नहीं बना था शायद
उन दिनों हमारी हंसी में
चाँद ,सूरज ,नदी, पहाड़
सभी शामिल थे ;
घरों के भीतर की जगह भी
तब हँसती रहती थी
आँगन से आकाश तक
हँसने में साथ होते थे हमारे,
हँसते समय तब मै
बड़ी निश्चिंत होती थी
सोचती-
यह कहीं नहीं जाएगी;
दुनिया के किसी भी कोने में तब
हंसा जा सकता था बेखौफ,
फिर चुपचाप जाने कब
बदलता चला गया सब
हँसने की जगह
रोना आता गया
शुरू में सिर्फ पलकें नम होती थीं
फिर ज़ोर ज़ोर से रोना हुआ
हाँलाकि पहले शर्म भी आती थी रोने में
तो छुप छुप कर रोती,
ज़ोर ज़ोर के रोने में
नामित थीं कई जगहें
कभी अयोध्या कभी मेरठ
कभी गोधरा तो कभी गुजरात,
अब तो हर वक्त डर बना रहता है
ऐसा लगता है कि स्टेशन -मास्टर
अभी भी छुपाये बैठा है
उस जलती रेलगाड़ी के टिकट
कभी भी
वह काटने लगेगा टिकट,
डर लगा रहता है कि कहीं
रोना भी न छिन जाये हमसे
और गिने चुने लोग
जो शामिल हैं रोने में
रोने को हंसना न समझ बैठें;
वैसे भी
रोने जैसा रोना भी कहाँ रहा अब !?!
क्या बचपन से तुम
इसी तरह रोती रही हो !
और सोचने लगी मै
उस समय के बारे में
जब हम
बिना रोये हुआ करते थे
रोने की जगह
हंसना होता था तब;
बात- बेबात बस
हँसते जाते पागलों की तरह
और हमारी हंसी में
शामिल हो जाती थी
पूरी दुनिया,
हँसने की जगह तब
रोना नहीं बना था शायद
उन दिनों हमारी हंसी में
चाँद ,सूरज ,नदी, पहाड़
सभी शामिल थे ;
घरों के भीतर की जगह भी
तब हँसती रहती थी
आँगन से आकाश तक
हँसने में साथ होते थे हमारे,
हँसते समय तब मै
बड़ी निश्चिंत होती थी
सोचती-
यह कहीं नहीं जाएगी;
दुनिया के किसी भी कोने में तब
हंसा जा सकता था बेखौफ,
फिर चुपचाप जाने कब
बदलता चला गया सब
हँसने की जगह
रोना आता गया
शुरू में सिर्फ पलकें नम होती थीं
फिर ज़ोर ज़ोर से रोना हुआ
हाँलाकि पहले शर्म भी आती थी रोने में
तो छुप छुप कर रोती,
ज़ोर ज़ोर के रोने में
नामित थीं कई जगहें
कभी अयोध्या कभी मेरठ
कभी गोधरा तो कभी गुजरात,
अब तो हर वक्त डर बना रहता है
ऐसा लगता है कि स्टेशन -मास्टर
अभी भी छुपाये बैठा है
उस जलती रेलगाड़ी के टिकट
कभी भी
वह काटने लगेगा टिकट,
डर लगा रहता है कि कहीं
रोना भी न छिन जाये हमसे
और गिने चुने लोग
जो शामिल हैं रोने में
रोने को हंसना न समझ बैठें;
वैसे भी
रोने जैसा रोना भी कहाँ रहा अब !?!
रोने जैसा रोना भी कहाँ रहा अब !?!
ReplyDeleteगंभीर बात है...
रोने हंसने के बीच कितने मंज़र और कारण बदल गए...
सुन्दर अभिव्यक्ति!
सादर!
sach rone ke kai rup ho gaye hai....sunder
ReplyDeleteज़ोर ज़ोर के रोने में
ReplyDeleteनामित थीं कई जगहें
कभी अयोध्या कभी मेरठ
कभी गोधरा तो कभी गुजरात,
गहन भाव लिए सुंदर रचना .... अब तो हर हादसा हादसा ही कहाँ लगता है ... बस एक खबर और दूसरे दिन भूल जाते हैं सब
बहुत सुंदर
ReplyDeleteक्या कहने
हम sensitive हैं और उतने ही insensitive भी...!
ReplyDeleteगहन भाव लिए सुंदर रचना !!
Thanx... to all !!
ReplyDeleteभगवान करे रोना छिन ही जाये तुम्हारा
ReplyDeleteखुशियों से भर जाये दामन तुम्हारा
हँसना ही बन जाये जीवन तुम्हारा
सही कहा सुशीला जी आप ने.. रोने जैसा रोना भी कहाँ रहा अब !? गहन भाव लिये बहुत सुन्दर रचना ...मैं पहली बार यहाँ आई बहुत अच्छा लगा....आभार
ReplyDeletebehad khubsurat bhaw sampreshan:)
ReplyDeletesushila ji bhavnaon ka bahut hi sunder sanyojan hai, behtareen lekhan
ReplyDeleteन रोया कभी जो वो हंसना क्या जाने
ReplyDeleteआंसुओं में छिपे हैं हंसी के खजाने
अच्छा लिखती हैं आप। ‘ठीक आदमजात सी बेखौफ दिखना चाहती हूं।’ आपकी यह बात छू गई। मेरा भी यही मानना है कि आजादी जीवन की पहली शर्त है। पहली बार आपका ब्लाग देखा, अच्छा लगा। मेरा भी सुमरनी नाम से एक अनियमित ब्लाग है। अगर आप जुड़ेंगी तो हौसला बढ़ेगा। शुभकामनाएं
नरेंद्र मौर्य
bhut umda our thithak kr pdhne ko badhy krti rchna , dil ke behd kreeb se gujrti hui .
ReplyDeleteगहन भाव लिए हुए अद्भुत रचना !! आखिर में प्रश्न करती पंक्ति बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है ..!
ReplyDeletebahut hi khobsoorat kavitayein
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteकभी हम बिन रोये भी हुआ करते थे _ _ _ बहुत सही ।
ReplyDeletehttps://navneetgoswamy.blogspot.com/