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Thursday, October 28, 2010

याद

याद आई ऐसे 
जैसे, हवा आई चुपके से 
और रच... गई साँस ,
बिना किसी आहट के 
जैसे, दाखिल हुई धूप 
कमरे मे 
और भर गई उजास ,
जैसे खोलकर पिंजड़ा 
उड़ गया पंक्षी 
आकाश मे 
और पंखों मे समा गया हो 
रंग नीला- नीला ,
जैसे, झरी हो ओस 
बिल्कुल दबे पाँव 
और पसीज गया हो 
मन का शीशा 
उजली सी दिखने लगी हो 
पूरी दुनिया.....,
जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण 
और धरती की तरह गोल 
माँ की कोख मे 
मचला हो नृत्य के लिए ....!

48 comments:

  1. paseej gaya hi man ka sheesha ,yad aayi jaise hava aayi chupame se rach gayi sans .bahut acha,bahut khoob likha hai badahio,sushila ji

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  2. ये यादें तो जीने का बहाना होती हैं...कभी हंसाती हैं तो कभी बेबात ही रुला भी देती हैं...और आपकी ये रचना बहुत ही सुन्दर हो... शुभकामनाएं..

    उदास हैं हम....

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  3. यादों को भ्रूण कहना ...एक दम नया प्रतीक ....सुन्दर रचना ..

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  4. जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण
    और धरती की तरह गोल
    माँ की कोख मे
    मचला हो नृत्य के लिए ....!
    Behad anoothee rachana!

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  5. जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण
    और धरती की तरह गोल
    माँ की कोख मे
    मचला हो नृत्य के लिए ....!
    bahut khoobsoorat lines... abhibhoot kardenewali rachna...

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  6. मन को छूने वाले कोमल भावों को उद्घाटित करती ये पंक्तियाँ शब्द दर शब्द नया बिम्ब गढ़ती हैं.उम्दा कविता .बधाई ! अरुण कमल की कविता याद आती है ---जैसे चींटी के शक्कर तोड़ने की आवाज ...जैसे गर्भ में बूंद गिरने की आवाज ...

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  7. bahut hi gajab ka lekhan hai aapka .......

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  8. अरसे बाद आपकी कविता आती है और अगली कविता आने तक जेहन में मचलती रहती है.. सर्वथा नया विम्ब लिया है आपने भ्रूण का .. सुंदर

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  9. सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  10. यह सच है कि हमें सांस के लिए निथरी हवा चाहिये, अंधेरों से उबरने के लिए उजास चाहिए, पंछी को पिंजरा नहीं खुला-नीला आकाश चाहिए, मन के शीशे को पारदर्शी बनाए रखने के लिए ओस सा झरता शीतल आलोक चाहिए - एक ऐसा उजला आलोक कि जिसमें मां की कोख में पलते भ्रूण की हंसी सुनाई कि उसका नर्तन के लिए मचलना स्‍पंदित हो - यह खूबसूरत अहसास फकत् स्‍मृति (याद) भर न बना रहे, इसी कोमल भाव को बहुत धीमे स्‍वर में बयान करती यह एक अच्‍छी कविता है, सुशीलाजी।

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  11. जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण
    और धरती की तरह गोल
    माँ की कोख मे
    मचला हो नृत्य के लिए ....!

    सुशीलाजी....नया विम्ब.... नया प्रतीक
    सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई

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  12. सुन्‍दर.....अति‍ सुन्‍दर।

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  13. हमारी हिन्दी की एक अच्छी कविता है यह । सुशीला जी!

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  14. तुम्हारी याद भी तुम जैसी है ....थोड़ी .चुलबुली ओर थोड़ी शर्मीली ....

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  15. जैसे पिंजड़ा खोल कर उड़ गया हो कोई पक्षी और अपने पंख में समा गया हो...
    याद बंदिनी ही नहीं बनाती, बांधती ही नहीं, मुक्ति-दायिनी भी होती है, यह इस कविता से जाना ! बधाई!

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  16. जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण
    और धरती की तरह गोल
    माँ की कोख मे
    मचला हो नृत्य के लिए ....!...वाह सुंदर अति सुंदर. सुशीला जी आपकी कविता गर्भ तक छू गई.

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  17. ma bchche ko jnm deti hai our rchnakar rchna ko .udahrn samne hai . dekho ho gya na kmaaaaal ! nye bimb ke liye sadhuwaad .

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  18. याद आई ऐसे
    जैसे, हवा आई चुपके से !!!
    यादो को ऐसे कोमल बिम्बों में उभारना कविता की बहुत बड़ी सफलता है ! नये बिम्ब प्रभाव शाली हैं ! चित्र की सुंदर बाला भावनाओं की गरिमा से परिपूर्ण है ! प्यारी सी कविता के लिए बधाई !

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  19. यादों के अहसास की प्रकृति के अनेक रूपों से अद्भुत तुलना करते हुए बेहतरीन प्रस्तुति ।

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  20. याद को तुमने अलौकिक विस्तार और गति दे दी है .यादें सजीव भी होती है और सांस लेती हैं यह तुम्हारी कविता पढ़ कर जाना ..
    और धरती की तरह गोल
    माँ की कोख मे
    मचला हो नृत्य के लिए .
    प्राण और तरंग से भरी हुई 'याद ' अप्रतिम है.बधाई.

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  21. याद के सहारे हम जीवन के कई पडाव तय करते हैं....जो हमारे प्राणों को नयी उर्जा से भरती है....हमेशा की तरह अदभुत लगा...

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  22. Smriti ko itne vividh roopon me aap jaisi rachnakar hi dekh sakti hai...Badhai...

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  23. Navintam prayas ............bahut accha laga ........

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  24. यादें ... सच है यादों चुपचाप चली आती हैं ... पर इनका सृजन भी हमारे अंतस से ही होता है ...
    कोई कुछ नहीं कर पाता इन यादों का ... बहुत लाजवाब कविता ...

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  25. mem pranam !
    ek achchi aur bhauk rachna hai . badhai
    sadhuwad !

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  26. जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण
    और धरती की तरह गोल
    माँ की कोख मे
    मचला हो नृत्य के लिए ....!

    क्या बिम्ब है ! अद्भुत.

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  27. अनछुए बिम्बों का सुन्दर प्रयोग.बहुत खूब.
    प्रकाश पर्व की ढेरों शुभकामनायें.

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  28. सुंदर रचना !
    दीपमाला पर्व की आपको बहुत बहुत बधाई हो

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  29. आपकी प्रोफाइल लाइन बहुत प्रभावित कर गयी ! भविष्य में पढने हेतु आपको फालो कर रहा हूँ !
    दीपावली की शुभकामनायें

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  30. जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण
    और धरती की तरह गोल
    माँ की कोख मे
    मचला हो नृत्य के लिए ....!

    ----

    सुंदर रचना !

    .

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  31. “नन्हें दीपों की माला से स्वर्ण रश्मियों का विस्तार -
    बिना भेद के स्वर्ण रश्मियां आया बांटन ये त्यौहार !
    निश्छल निर्मल पावन मन ,में भाव जगाती दीपशिखाएं ,
    बिना भेद अरु राग-द्वेष के सबके मन करती उजियार !! “

    हैप्पी दीवाली-सुकुमार गीतकार राकेश खण्डेलवाल

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  32. सुहानी लगे हर गली आपको,
    लगे फूल-सी हर कली आपको.
    सुखी रक्खें बजरंगबली आपको,
    मुबारक हो दीपावली आपको.

    कुँवर कुसुमेश

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  33. दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !

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  34. realy nice & wish u a happy diwali and happy new year

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  35. Jiwan ki khatti Mithi yaden hi to hame jine ki prerana deti hai.yadi jiwan se hum yadon ko nikal de to jine ke liye kuchh bhi nahi rah jata hai.Jane wale to chale jate hain lekin unki yadn hi unki uoasthiti ka ehsas karati rahti hain. Nice post.Wish u a happy Diwali.

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  36. आदरणीया सुशीला पुरी जी
    नमस्कार !

    आपकी रचना "याद" बहुत प्रभावित करती है ।

    याद आई ऐसे
    जैसे, हवा आई चुपके से
    और रच... गई साँस ,
    बिना किसी आहट के
    जैसे, दाखिल हुई धूप
    कमरे मे
    और भर गई उजास !

    तमाम बिंब कविता की ख़ूबसूरती में चार चांद लगाने वाले हैं ।
    अच्छी श्रेष्ठ कविता के लिए आभार और बहुत बहुत बधाई !

    आपको और परिवारजनों को
    दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं !

    सरस्वती आशीष दें , गणपति दें वरदान !
    लक्ष्मी बरसाएं कृपा , बढ़े आपका मान !!


    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  37. जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण
    और धरती की तरह गोल
    माँ की कोख मे
    मचला हो नृत्य के लिए ..
    ise kahte hai dil se nikli hui rachna , badhai

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  38. जैसे ,गर्भ मे हंसा हो भ्रूण
    और धरती की तरह गोल
    माँ की कोख मे
    मचला हो नृत्य के लिए ..
    *अहा ! क्या तुलना की है याद की...बहुत सुन्दर!

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  39. सुशीला जी, सुन्दर और अद्भुत बिम्बों वाली कविता ----अत्यन्त प्रभावशाली।

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  40. आप सभी का हार्दिक आभार .....शुक्रिया !!!

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  41. दाखिल हुई धूप
    कमरे मे
    और भर गई उजास ।

    जय हो!

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