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Saturday, October 2, 2010

उपस्थिति

तुम नहीं थे 
तब भी थे तुम 
स्पर्श की धरा पर 
हरी घास से 
बीज के भीतर
वृक्ष थे तुम ,
बाँसुरी से 
अधर पर 
नहीं थे तुम 
तब भी थे 
अमिट राग से ,
मौन के आर्त पल मे 
स्वरों का हाथ थामे 
व्याप्त थे पल पल 
शब्द पश्यन्ती 
महाकाव्य से ....!  

36 comments:

  1. सुंदर शब्दों के साथ.... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

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  2. सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

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  3. बहुत सुन्दर रचना .बधाई

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  4. स्पर्श की धरा पर
    हरी घास से
    बीज के भीतर
    वृक्ष थे तुम ,

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  5. इस कविता को केवल महसूस किया जा सकता है...

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  6. बीज के भीतर
    वृक्ष थे तुम

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  7. बहुत कोमल अहसास लिए रचना । बेहतरीन, सुशीला जी ।

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  8. बहुत कोमल सी सुन्दर अभिव्यक्ति

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  9. कविता मन को छू गई....बहुत अच्छा लिख रहीं हैं आप...

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  10. बाँसुरी से
    अधर पर
    नहीं थे तुम
    तब भी थे
    अमिट राग से ...

    छू गयी आपकी रचना ... प्रेम के भोले एहसास से रची ... मधुर संगीत सी रचना है ....

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  11. दिल को छू लेने वाली कविता.

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  12. bahut hi sundar kavita..
    yun hi likhte rahein...
    मेरे ब्लॉग पर इस बार ....
    क्या बांटना चाहेंगे हमसे आपकी रचनायें...
    अपनी टिप्पणी ज़रूर दें...
    http://i555.blogspot.com/2010/10/blog-post_04.html

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  13. बीज के भीतर
    वृक्ष थे तुम !!!
    कुछ सम्बन्ध शाश्वत होते हैं ! महीन बुनावट के साथ कोमल कविता बधाई !!!

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  14. कम शब्दों में बहुत कुछ कह देना...आपकी रचना यही दर्शाती है
    मुझे रचना बहुत पसंद आई

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  15. prem drisht roop se na ho kar bhi kahin na kahin bhitar vyapt hota hai...bahut hi suksham ahsaas ko prkt karti kavita hai...congtates

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  16. यह जो देह-अदेह के बीच प्रेम का पुल है उस पर तफरीह करना आच्‍डा लगता है। वहां घास की जड़ों में दरख्‍त और दरख्‍तों की फुनगियों में घास के खयाल होते हैं, हमारी शक्ति के स्रोत। अच्‍छी कविता के लिए बधाई।

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  17. सधे शब्दों की सुंदर प्रस्तुति......

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  18. बीज के भीतर
    वृक्ष थे तुम


    -गज़ब! उम्दा प्रस्तुति!

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  19. काश! आपकी कवितआओं-सा प्यार कर पाऊँ ज़िन्दगी को.........

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  20. इस बेहतरीन रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें...इतने सुन्दर भाव और शब्दों का प्रयोग किया है आपने के बार बार वाह करने को जी कर रहा है...

    नीरज

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  21. 'मौन के आर्त पल मे
    स्वरों का हाथ थामे
    व्याप्त थे पल पल
    शब्द पश्यन्ती
    महाकाव्य से ....! '

    *****अद्भुत!अद्भुत!!अद्भुत!!!*******

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  22. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  23. नहीं होने पे भी होने का आभास ,
    कोई अनहद नाद सा अमित राग,
    जो कही नहीं वो यही कही...
    स्वरों का हाथ थामे मन कहीं दूर निकल गया ..

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  24. shabdon main us "tum" ki upasththi mehsus hoti hai....

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  25. दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

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  26. सुशीला जी,
    आपकी काव्य-भाषा और कविता में अनुस्यूत भावों-विचारों पर मुग्ध हूँ!
    मुझे मेरी कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं-

    "तुम सवालों में हो, तुम जवाबों में हो।
    मेरी आँखों की इन दो किताबों में हो।"

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  27. अति सुन्दर रचना ......
    रचना के लिए बधाई....

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  28. Didi Ji Bahut Sunder Rachna .Badhai

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  29. आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया !!!

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