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Wednesday, September 8, 2010

पावस रोज ही

भीगना 
सिर्फ पावस में ही नहीं होता  
उसकी बातें  
भिगोती हैं  
रोज ही  
धरती की तरह  
धानी चूनर  
ओढ़ लेती हूँ मैं । 

44 comments:

  1. वाह! बहुत खूब कहा.

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  2. प्रेम की अदभुद व्याख्या... किसी की बातें जब पावस हो जाए.. धरती तो हो ही जाएगा मन... सुंदर कविता....

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  3. Behad sundar rachana..mere paas aksar alfaaz nahi hote...kalse comment dene ki koshish me hun,par net me kuchh samasya thi jo de nahi payi.

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  4. वाह ...बहुत सुन्दर ...उसकी बातें .पावस की तरह ...

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. सुशीला जी...

    पावस से सबका तन भीगे...
    और बातों से मन भीगे...
    धानी चुनर, धरा सी..ओढ़े...
    मन बातों से ही चहके...

    सुन्दर भाव....सच में...

    दीपक....

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  7. इस काव्यालय के चक्कर में सभी कवि बन गए बिहारी...
    सुशीला जी मतलब तो आप समझ ही गई होगीं..

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  8. सच है प्रेम ही नही उसका एहसास भी भिगो जाता अंदर तक ... प्रेम को कुछ शब्दों में भी कहा जा सकता है ...

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  9. bahut sundar !!roz hii paawas toh sirf pyaar men hota hai ...

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  10. धानी चूनर...और भीगना...
    बेहतर...

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  11. पावस और धानी --आपने तो पल्ले ही नहीं पड़ा सुशीला जी ।
    मानने में कैसी शर्म !

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  12. ओह , मांफ कीजियेगा , लिखने में गलती हो गई । मेरा मतलब था -अपने (मेरे ) समझ में नहीं आया , पायस और धानी का मतलब ।

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  13. shusheela
    khoobsurat ehsas shbdbddh ho ke pnno pe utr aaye to kuchh isi trha ki njm bnti hai .
    dral saheb ki masumiyt bha gai . mgr unki shnka ka smadhan apekchhit hai .

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  14. सम्माननीय दराल जी ! 'पावस' का अर्थ होता है वर्षा ऋतु और 'धानी' एक ऐसे रंग के संबोधन मे आता है जो हरी हरी घास का रंग होता है या हरियाली का ही पर्याय...। आपका आभार...!

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  15. beautiful lines Sangeeta ji. Very touching and meaningful.

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  16. धानी चूनर.........
    सुन्दर शब्द ...
    सुन्दर कविता !!!

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  17. पावस है की उसकी बातें हैं ,,,उसकी बातें हैं की पावस हैं ! संदेह अलंकार है ! बता दो न ! किसकी बातें !सुंदर रचना ! बधाई !

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  18. सुन्दर रचना।

    यहाँ भी पधारें :-
    No Right Click

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  19. हे आदमजात सी बेखोफ सुशीला....ये पावस हमें भी मारे है. इस मौसम में मन रीतिकालीन हो जाता है..धानी चूनर ओढकर पृथ्वी हो जाओ आप.शानदार अभिव्यक्ति.

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  20. बहुत सुन्दर विचार हैं..........

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  21. वाह सुशीला जी । अब समझ में आया । आभार ।

    प्रेम की बरखा यूँ ही होती रहे ।
    बहुत सुन्दर अहसास ।

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  22. Behatareen kavita Susheela dee,---barish kee anubhootiyon ko kam lekin prabhavashalee shabdon men bandha apne.
    Poonam

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  23. सुंदर शब्द और सुंदर भाव.....
    बहुत अच्छी प्रस्तुति ....

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  24. हिन्दी दिवस पर आपको बहुत-बहुत बधाई।

    http://sudhirraghav.blogspot.com/

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  25. प्रेम का सुन्दर व्याखान ....

    गणेशोत्सव और हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामना

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  26. क्या बात है सुशीला जी! वाह.

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  27. ऊषा जी ! प्रेम को आत्मसात करने के बाद समूची पृथ्वी ही अपनी लगती है ...., संदेह तो कहीं है ही नहीं...पावस को बीच मे लाने का मकसद मात्र इतना है कि पावस को उल्लास और खुशी का मौसम माना गया है ,मेरी पंक्तियों पर ध्यान दीजिएगा -- 'उसकी बातें',यहाँ उसकी बातों का तात्पर्य निश्चितरुप से प्रिय की बातों की ही बात है और ये बातें जरूरी नहीं की 'उसी'से ही हो रही हों ,दुनिया मे कहीं भी उसकी बातें होंगी तो पावस को तो आना ही होगा यदि आप प्रेम मे होंगे.....!!!

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  28. वाह ...बहुत सुन्दर ......

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  29. कम शब्दों में बेहतरीन भाव .....!!

    धानी - धान की पत्तियों सा रंग ...हल्का हरापन लिए ......

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  30. सुन्दर है। मामला ऐसा ही हरा-भरा बना रहे।

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  31. भीगना
    सिर्फ पावस में ही नहीं होता
    उसकी बातें
    भिगोती हैं
    रोज ही


    सचमुच समूचा भींगना ही है यह।


    बारिश में आज दिन भी सलामत नहीं रहे
    रह-रह के यूं पड़ती रही यादों की फुहारें।

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  32. आपके ब्लाग में लगे तमाम चित्र उद्वेलित करते हैं।

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  33. सच लिखा.सुंदर अभिव्यक्ति.

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  34. sushila mem
    namaskar 1
    ...बहुत सुन्दर ...उसकी बातें .पावस की तरह

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  35. रोज ही
    धरती की तरह
    धानी चूनर
    ओढ़ लेती हूँ मैं ।
    बहुत ही खूबसूरत पक्ति सुन्दर चित्र

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  36. बेहद कम शब्‍दों में एक साथ कई बातें कहने काम आपका हुनर अनूठा है। चार रूपकों से प्रेम की जो सृष्टि आपने की है वह अतुल्‍य है। ऐसी ही उत्‍कृष्‍ट कविताओं की अपेक्षा रहती है आपसे।

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  37. आप ने तो वही बात कह दी जो शाश्वत है!

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  38. बारिश तो गई लेकिन पंक्तियाँ अच्छी लगीं

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  39. आप सभी हार्दिक आभार ....आपकी visit मेरी प्रेरणा है !!!

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