Pages

Friday, March 4, 2011

नदी और वसंत

नदी के भीतर 
खुशी का  गाँव बस जाता है 
जब वसंत में बहती है वो ,
बेसुध हवा भटकती है 
बंजारन गंध लिए 
नदी में घुलती है जब 
वो मधुमय गंध 
नदी भी समूची 
बंजारन हो जाती है ,
फूलों को देखने के बाद भी 
बचा रहता है 
बहुत कुछ देखने जैसा 
अनकहा ;अकथ अभिप्राय 
उनमन नदी नहाती है 
सौंदर्य के वे अनगिन पल 
और उस अकथ की 
सारी अंतर्कथा, 
सभ्यता की चौखटों से दूर 
तितलियाँ अलमस्त उड़ती हैं 
यहाँ से वहाँ पराग लिए 
अपनी स्निग्ध लहरों में 
धुन बांध बहती है नदी 
सरगम नदी ! 

29 comments:

  1. सभ्यता की चौखटों से दूर
    तितलियाँ अलमस्त उड़ती हैं
    यहाँ से वहाँ पराग लिए

    बसंत की सुन्दर तस्वीर उतारी है आपने , एक अनोखे अंदाज़ में ।
    बसंत की शुभकामनायें सुशीला जी ।
    इस बार बहुत दिनों बाद लिखना हुआ ।

    ReplyDelete
  2. बहुत कुछ देखने जैसा
    अनकहा ;अकथ अभिप्राय
    उनमन नदी नहाती है
    सौंदर्य के वे अनगिन पल
    और उस अकथ की
    सारी अंतर्कथा,
    सभ्यता की चौखटों से दूर
    तितलियाँ अलमस्त उड़ती हैं
    यहाँ से वहाँ पराग लिए
    अपनी स्निग्ध लहरों में
    धुन बांध बहती है नदी
    सरगम नदी !

    अद्भुत.....शब्द कितना महत्वपूर्ण रच देते है न कभी कभी !

    ReplyDelete
  3. sundar bhav sampreshan .. aur utna hi khoobsoorat shabd sanyojan..

    ReplyDelete
  4. बेसुध हवा भटकती है
    बंजारन गंध लिए
    नदी में घुलती है जब
    वो मधुमय गंध
    नदी भी समूची
    बंजारन हो जाती है

    सभ्यता की चौखटों से दूर
    तितलियाँ अलमस्त उड़ती हैं
    यहाँ से वहाँ पराग लिए
    अपनी स्निग्ध लहरों में
    धुन बांध बहती है नदी
    सरगम नदी !

    वसंत में अलमस्त इस नदी के किनारे ही बसने का जी चाह रहा है..सुंदर!!!!

    ReplyDelete
  5. बेसुध हवा भटकती है
    बंजारन गंध लिए
    नदी में घुलती है जब
    वो मधुमय गंध
    नदी भी समूची
    बंजारन हो जाती है


    बहुत सुंदर..... बसंत और मन के भावों को एक साथ पिरोया है आपने...... बेहद खूबसूरती से.....

    ReplyDelete
  6. अच्छी कविता...बधाई....

    ReplyDelete
  7. धुन बांध बहती है नदी
    सरगम नदी !
    मन को छू लेने वाली अद्भुत कविता....

    ReplyDelete
  8. यहाँ से वहाँ पराग लिए
    अपनी स्निग्ध लहरों में
    धुन बांध बहती है नदी
    सरगम नदी !

    Kitni nafees ,nazuk kalpana hai!

    ReplyDelete
  9. सरगम नदी !
    नदी सरगम!!

    ReplyDelete
  10. फूलों को देखने के बाद भी
    बचा रहता है
    बहुत कुछ देखने जैसा

    कुछ सौन्दर्यमयी रचनाओं पर
    शाब्दिक प्रतिक्रिया नहीं दी जा सकती ,
    बस-सुनों और पलकें मूँद कर किसी
    स्वप्न के लिए आँखें खोल दो !

    ReplyDelete
  11. मनोरम कविता... अव्यक्त को व्यक्त करते आपके शब्द कितनी स्निग्धता के साथ कविता का रूप धर लेते हैं....सुन्दर!

    सुशीला जी,शुभकामनाएँ व बधाई!

    ReplyDelete
  12. "Aap yoon faaslon se guzarte rahe...
    Dil se qadmon kki aawaaz aati rahi.."
    ...
    Aur

    Qatra=qatra pighalta raha aasmaan...
    Ik nadi dilruba-se gaatee rahi...
    Aap yoo...

    Bas, yoon hi...

    Tumne kaha to Snowa se tha,
    magar aa mai gai :

    HIMBALA !
    un dono ke khaate me se....
    Bachna ai Haseeno!
    Lo mai aa gai!!

    ReplyDelete
  13. सभ्यता की चौखटों से दूर
    तितलियाँ अलमस्त उड़ती हैं
    यहाँ से वहाँ पराग लिए
    अपनी स्निग्ध लहरों में
    धुन बांध बहती है नदी
    सरगम नदी !

    vasant beetne wala hai, lekin aapne fir se titliyon ko uda diya.........:)
    ek almast tajgi deti rachna..!

    ReplyDelete
  14. देर तक ज़हन में बजती रह जाने वाली- एक बंजारी धुन... सरगम नदी की.
    खूबसूरत अभीव्यक्ती!!

    ReplyDelete
  15. नदी ... पवन ... गंध ... तितलियों की उड़न .. पराग ... बहुत से मौसमों को नदी के प्रवाह मेंन समेत दिया है ... बसंत के साथ ... लाजवाब ल्लिखा है ...

    ReplyDelete
  16. नदी में घुलती है जब
    वो मधुमय गंध
    नदी भी समूची
    बंजारन हो जाती है ,

    बहुत खूब...सुन्दर भाव

    ReplyDelete
  17. सुशीला मेम !
    नमस्कार !
    बेसुध हवा भटकती है
    बंजारन गंध लिए
    नदी में घुलती है जब
    वो मधुमय गंध
    नदी भी समूची
    बंजारन हो जाती है
    बहुत सुंद बसंत और मन के भावों को एक साथ पिरोया है आपने, बेहद खूबसूरती से!
    सादर

    ReplyDelete
  18. सभ्यता की चौखटों से दूर
    तितलियाँ अलमस्त उड़ती हैं...

    बेहतर कविता...

    ReplyDelete
  19. सभ्यता की चौखटों से दूर
    तितलियाँ अलमस्त उड़ती हैं
    यहाँ से वहाँ पराग लिए
    अपनी स्निग्ध लहरों में
    धुन बांध बहती है नदी
    सरगम नदी

    kya baat hai, pehli baar aya hu. aab aap jab-2 naya likhengi tab-tab aana hoga. apko follow kar liya hai.

    ReplyDelete
  20. बेहद खूबसूरती से मन के भावों को पिरोया है|धन्यवाद|

    ReplyDelete
  21. आदरणीया सुशीला पुरी जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    नदी और वसंत रचना पढ़ कर आनन्दनिमग्न हो गया …

    फूलों को देखने के बाद भी
    बचा रहता है
    बहुत कुछ देखने जैसा
    अनकहा ;अकथ अभिप्राय
    उनमन नदी नहाती है
    सौंदर्य के वे अनगिन पल

    आपकी लेखनी का ज़ादू अवाक कर रहा है …
    अद्भुत् ! अनिर्वचनीय ! अद्वितीय !


    ♥बसंत ॠतु की आपको हार्दिक बधाई !♥
    शुभकामनाएं !!
    मंगलकामनाएं !!!


    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  22. बहुत अच्छा अति सुन्दर बस इसी तरह लगे रहिये
    http://vangaydinesh.blogspot.com/

    ReplyDelete
  23. sushila di
    nadi aur basant ka adhhbhut chitran prastut kiya hai aapne .shabdo ke ati sundar chayan ne aapki rachna ko bahut hi behatreenabhivykti pradaan ki hai
    bahut hi uamda
    sadar dhanyvaad
    poonam

    ReplyDelete
  24. आप सभी का बहुत बहुत आभार और होली की हार्दिक बधाई !

    ReplyDelete
  25. फूलों को देखने के बाद भी
    बचा रहता है
    बहुत कुछ देखने जैसा
    अनकहा ;अकथ अभिप्राय !!!
    सब कुछ कह देने के बाद भी कुछ बचा रहता है कहने को ! उसका काव्य में बहुत महत्व है ! और वो आपकी कविता में है ! बधाई !

    ReplyDelete
  26. सराहनीय लेखन कोटि-कोटि बधाई।
    ========================
    प्रवाहित रहे यह सतत भाव-धारा।
    जिसे आपने इंटरनेट पर उतारा॥
    ========================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
    ========================

    ReplyDelete
  27. Didi Ji Sadar Pranam, Sunder bhavpurn Rachna ke liye hardi Badhai sweekar karein

    ReplyDelete
  28. कभी कभार वो तितलियाँ यहाँ तक आ जातीं हैं. जहाँ कोई चौखटें नहीं नहीं हैं .... बस हवाएं ज़रा सी बेरहम हैं.........
    तृप्त करते हुए शब्द . आभार!

    ReplyDelete

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails