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Saturday, October 1, 2011

पान

रूंधना पड़ता है 
चारो तरफ से 
बनाना पड़ता है 
आकाश के नीचे 
एक नया आकाश, 
बचाना पड़ता है 
लू और धूप से 
सींचना पड़ता है 
नियम से, 
बहुत नाज़ुक होते हैं रिश्ते 
पान की तरह, 
फेरना पड़ता है बार बार 
गलने से बचाने के वास्ते 
सूखने न पाये इसके लिए 
लपेटनी पड़ती है नम चादर, 
स्वाद और रंगत के लिए 
चूने कत्थे की तरह 
पिसना पड़ता है  
गलना पड़ता है,
इसके बाद भी 
इलायची सी सुगंध 
प्रेम से ही आती है !  

32 comments:

  1. अच्छी कविता। बधाई सुशीला दी...

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  2. सच में प्रेम है ही ऐसी चीज़ कि उसे पान की फसल की तरह बहुत अवेरना होता है। रिश्‍तों की नजाकत और उसमें भी प्रेम संबंध को लेकर बिल्‍कुल नए ढंग से यह कविता कई नई बातें कहती हैं। एक बार फिर सुशीला जी की पारखी नज़र की दाद देनी होगी। लाजवाब...

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  3. बहुत नाज़ुक होते हैं रिश्ते
    पान की तरह,
    फेरना पड़ता है बार बार
    गलने से बचाने के वास्ते
    सूखने न पाये इसके लिए
    लपेटनी पड़ती है नम चादर, वाह,
    .... खूबसूरत अभिव्यक्ति। बधाई।

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  4. पान की तरह ही फेरना पड़ता है रिश्तों को ...बहुत खूबसूरत चिंतन

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  5. अथ आमंत्रण आपको, आकर दें आशीष |
    अपनी प्रस्तुति पाइए, साथ और भी बीस ||
    सोमवार
    चर्चा-मंच 656
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  6. बहुत नाज़ुक होते हैं रिश्ते
    पान की तरह,
    फेरना पड़ता है बार बार
    गलने से बचाने के वास्ते
    सूखने न पाये इसके लिए
    लपेटनी पड़ती है नम चादर,


    नई उपमाओं की सुन्दर कविता के लिए बधाई...

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  7. पिसना पड़ता है
    गलना पड़ता है,
    इसके बाद भी
    इलायची सी सुगंध
    प्रेम से ही आती है ! bahut khooooooooooob......

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  8. बहुत सुन्दर...जैसे दिल एक पान का पत्ता....आशाओं का चूना और चाहतों का कत्था.........!

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  9. bahut hi sunder wakai pan ki tarah hi sambhandho mei ushma kaa sanchaar kerne hetu hame bhi apni bhavnao kaa vicharo ka sambvednao kaa perishkaar kerna hota hai v pan ki tarah hi us sambhandh ko apnejeevan mei mahtav dena hota hai ..sahaj sampreshniy v sunder kavita

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  10. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 03-10 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में ...किस मन से श्रृंगार करूँ मैं

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  11. बहुत नाज़ुक होते हैं रिश्ते
    पान की तरह,
    फेरना पड़ता है बार बार
    गलने से बचाने के वास्ते
    सूखने न पाये इसके लिए
    लपेटनी पड़ती है नम चादर,
    स्वाद और रंगत के लिए
    चूने कत्थे की तरह
    पिसना पड़ता है
    गलना पड़ता है,
    Bilkul sahee farmaya!

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  12. शुभकामनाएं||
    बहुत ही बढ़िया ||
    बधाई |

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  13. बहुत सुन्दर प्तथा सार्थक रचना, आभार

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  14. ये तो अद्भुत बात कही:
    बहुत नाज़ुक होते हैं रिश्ते
    पान की तरह,
    फेरना पड़ता है बार बार
    गलने से बचाने के वास्ते


    जय हो! बधाई आपको!

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  15. शिव मंगल सिंह सुमन ने पान को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनाया आपने प्रेम के पल्लवन सिंचन हिफाज़त का बेहद सुन्दर सार्थक सन्दर्भ उठाया सच मुच नाज़ुक होती है पान की बेल ,आपने सारा विज्ञान भी लिख दिया .जानकारी से भरपूर (पोस्ट) काव्यात्मक अभिव्यक्ति.बधाई इस अप्रतिम कविता के लिए .

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  16. सही कहा है आपने ..रिश्ते भी पान की तरह ही नाजुक होते हैं

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  17. सही है दीदी ,,,,,,रिश्ते बहुत अनमोल होते हैं उन्हे बचाने के लिए उन्हे ऐसे सहेजना पड़ता है !!!!

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  18. इलायची की खुशबू प्रेम से ही आती है ...
    इस सुगन्धित रचना के लिए आभार !

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  19. अनोखी उपमा है रिश्ते की लेकिन सच्ची बात कह गयी है ....

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  20. बहुत नाज़ुक होते हैं रिश्ते
    पान की तरह,
    फेरना पड़ता है बार बार
    गलने से बचाने के वास्ते ...
    बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति...
    सादर...

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  21. पान को बिम्ब बना कर गूढ़ बात को कितनी सहजता से कह दिया.

















    -

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  22. ओह प्रेम तुम अब भी कितने रहस्मय हो ? कितने सालो से .....

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  23. आभार आप सभी का ...दिल से !!!

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  24. बहुत नाज़ुक होते हैं रिश्ते
    पान की तरह,
    सुन्दर विम्ब!

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  25. thanks susheela ki tumne meri frmaish pr ye khoobsoorat our behd nrm kvita blog pr dali .

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  26. स्वाद और रंगत के लिए
    चूने कत्थे की तरह
    पिसना पड़ता है
    गलना पड़ता है,
    इसके बाद भी
    इलायची सी सुगंध
    प्रेम से ही आती है !

    just excellent...!

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